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Mahender Kumar

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"सनातन (पुरानी) संस्कृति वेदों की देन, वेदों में क्या है पढ़िए"


 
वेद परिचय

ऋग्वेद - इस वेद में 10589 मंत्र,10 मंडल , 1.028 सूक्त ,209 देवता , 354 ऋषि, हैं ।
इस वेद में 153826 शब्द, एवं 432000 अक्षर हैं। ऋग्वेद में 74 बार धर्म शब्द का व 45 प्रकार की अग्नियों का उल्लेख मिलता है। इस वेद के ऋषि अग्नि हैं इस वेद के विषय- "विज्ञान, पदार्थ गुण धर्म , देवों की स्तुतियां , सृष्टि रहस्य, नक्षत्र , अर्थशास्त्र, पशु पालन, परिवार सुख, मृत्यु पर विजय, आशावाद, एक- ईश्वरवाद आदि हैं।"...

यजुर्वेद

इस वेद के ऋषि वायु है यजुर्वेद में 1975 मन्त्र , 40 अध्याय हैं जिनमें 39 अध्याय में यज्ञ का वर्णन है । 40 वे अध्याय में अध्यात्मिक विद्या का वर्णन है जिसमें 700 मन्त्र ऋग्वेद के हैं । यजुर्वेद का विषय- यज्ञ में समिधा चयन, मार्जन, भूमि, सर्व मेघ यज्ञ, शुद्धि, अन्त्येष्टि संस्कार व प्रार्थना है।
अन्य विद्यायें - सूर्य , चन्द्र , पृथ्वी, भूगोल, खगोल, अग्नि, जल ,वायु,अंकगणित, बीजगणित ,अौषधि, ज्योतिष, युद्ध कला , आदि का वर्णन है ।

सामवेद

इस वेद के ऋषि आदित्य है । सामवेद में 1875 मंत्र 27 अध्याय व 87 साम हैं इसके तीन भाग हैं पूर्वार्चिक 640 मंत्र, महानामी भाग में 10 मंत्र, व उत्तरार्चिक भाग में 1225 मंत्र हैं।

सामवेद का अर्थ समन्वय है ।सामवेद के मन्त्र मिलकर पढ़ें जाते हैं। सामवेद के 1875 मन्त्रो मे से 1590 मन्त्र ऋग्वेद के हैं । अन्य वेदों के भी मंत्र सामवेद में आए हैं । इस वेद के मंत्रो को एक हजार प्रकार से गाया जा सकता है जिसको साम गान कहा गया है । चारो वेदों के चुने मंत्र इसमें गुलदस्ते की तरह एकत्रित किए गए है।इसलिए यह उपासना का वेद है । तीन वेद में अलग अलग विषय हैं लेकिन सामवेद में प्रभु ही प्रधान विषय है ।

अथर्ववेद

इस वेद के ऋषि अंगिरा है अथर्ववेद में 5977 मंत्र , 20 कांड , 731 सूक्त, हैं अथर्ववेद का 20वा कांड अोर 1200 मंत्र ऋग्वेद से लिए गए है । इस वेद के 19 कांडो में 27 नक्षत्रों का वर्णन है ।

अथर्ववेद में अनेक विषय हैं । गृहस्थ , जन्म , विवाह , मृत्यु , ब्रह्मचर्य , अध्यात्म , कृषि ,आौषधि ,गणित,पृथ्विसूक्त ,चिकित्सा , व अन्त्येष्टि महायज्ञ का वर्णन है ।

वेद मंत्रों के साथ प्रयुक्त ऋषि शब्द का अभिप्राय

निरुक्त के अनुसार " ऋषियो मंत्र द्रष्टार: " अर्थात मंत्रों का दर्शन करने वाला ही ऋषि होता है ।

ईश्वर को अनुभव करते हुए ज्ञान से तृप्त,राग रहित, परमशांत आनंदित जो होते हैं वो ही ऋषि होते हैं । महर्षि दयानंद के अनुसार सृष्टि के प्रारम्भ. में जब वेदों का प्रकाश हो चुका तभी से ऋषि लोग वेद मंत्रों के अर्थ विचार करने लगे । जिस जिस शब्द का अर्थ जिस जिस ऋषि नें प्रकाशित किया उस उस ऋषि का नाम उनके मंत्र के साथ स्मरण के लिए लिखा गया ।

वेद मंत्रों के साथ प्रयुक्त देवता शब्द का अभिप्राय

प्रत्येक मंत्र के साथ जहां ऋषि बताया वहां देवता भी बताया गया है । यहां देवता का अर्थ विषय है उपास्य नही । जो विषय किसी मंत्र द्वारा प्रतिपादित किया जाता है उस मंत्र का देवता है ।

मंत्र में जिस नाम की स्तुति हो रही होती है या जो मंत्र में आत्म परिचय प्रस्तुत कर रहा होता है वह उस मंत्र का देवता है ।

उदाहरण- विश्वानि देव सविता: (ऋ.-५-८२-५) इस मंत्र में सविता से भद्र की प्राप्ति की याचना की गई है अत: इस मंत्र का देवता सविता है ।

वेद मंत्रों के साथ प्रयुक्त "छंद" एवं " स्वर " शब्द का अभिप्राय ।प्रत्येक वेद मंत्र के साथ छंद व स्वर भी दिए गये हैं। महर्षि दयानंद के मतानुसार छंद व स्वर का ज्ञान भी होता रहे इसलिए मंत्र के साथ ही दे दिए गए हैं । सभी वेद मंत्र छंदों में हैं। केवल यजुर्वेद में कुछ मंत्र गद्य में हैं । "वेदों में 4 अक्षर से लेकर 104 अक्षर तक के मंत्र मिलते हैं ।" वेदों में अनेक छंद मिलते है जैसे गायत्री, पंक्ति, बृहती, जगती आदि । जैसे हम चरण के बिना गति नही पा सकते वैसे ही मंत्र छंद के बिना आगे नही बढ़ते । वेदों में 26 छंद है ।

ऋग्वेद में 13 छंद हैं,।गायत्री 2 उष्णिक 3 अनुष्टुप 4 बृहती 5 पंक्ति 6 त्रिष्टुप 7 जगती 8 अति जगती 9 शक्चरी 10 अति शक्चरी 11 सृष्टि 12 अत्यष्टि 13 धृति

यजुर्वेद में 8 छंद हैं ।1अतिधृति 2 कृति 3 प्रकृति 4 आकृति 5 विकृति 6 संस्कृति 7 अभिकृति 8 उत्कृति ।

अथर्ववेद में 5 छंद है 1उक्ता 2 अत्युक्ता 3 मध्या 4 प्रतिष्ठा 5 सुप्रतिष्ठा

सामवेद में दोनों वेदों में प्रयुक्त छंद मिलते है जिनके 231 भेद प्रभेद हैं ।

वेद मंत्र के साथ प्रयुक्त 'स्वर' शब्द का अभिप्राय ।

मुख्यत: स्वर तीन होते हैं । उदात्त अनुदात्त स्वरित । ऊंचे स्वर में उच्चारण को उदात्त, मन्द स्वर में उच्चारण को अनुदात्त और दोनों स्वरों के मिश्रण समावेश को स्वरित स्वर कहा गया है ।
Posted in Religious on September 01 2020 at 08:26 PM

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